Saturday, March 12, 2016

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ना समेटो चन्द अल्फाजों में हमें ...
खुल गये तो कई क़िस्सों में बिखर.जाएँगे...
जला के देख लो गर यक़ीन नही ...
जल के कुछ और.. निखर आएँगे ..
ना बदलो हमें, बदलना हमारी फ़ितरत नही
जो बदले तो.., बहुत कुछ बदल जाएँगे ...
हटा दो अब उसूलों की बंदिशें हमसे ...
जो लगेगी ठोकर तो खुद ही संभल जाएँगे ..

Thursday, February 19, 2015

फिर से

फिर पलकों में रात जागी है ..
फिर  नींद का नामोंनिशा ना था…
फिर से ख्वाब बेच के, खरीदा है रतजगा…
ना अंधेरे थे .. ना यादों का कारवाँ था ..
फिर से.. एक रात गुज़री है सुकून से …
फिर से जागी है इक सुबह…
लेकर आँखों में…  कोई जुनून से …
फिर से लगा है कि.. दिन हो गया है …
फिर से लगा है कि मुश्किल था…
जो ‘कल’ वो  ’आज’ कुछ मुमकिन हो गया है .

Tuesday, May 13, 2014

जो मंज़िल समझते रहे सफ़र भर.....

"जो मंज़िल समझते रहे सफ़र भर.....
वो फकत रास्ते निकले ......
हम रह गये जिनके होकर.... 
आख़िर.. कुछ ना उनके वास्ते निकले ....
जिनकी बस्ती में ..बसती थी  मेरी भी कहानी
करके तन्हा मुझे.. वो किरदारों के काफिले निकले ..."

Tuesday, February 18, 2014

हर सुलझन में.. इक उलझन है
इतनी उलझी हुई सी .. ज़िदगी क्यों है तू…?

कोई ना समझे.. मेरी उलझन …
सबकी सुलझी हुई सी.. ज़िदगी क्यों है तू…?

दूसरा खो जाता है .. जो इक सिरा मैं ढूँढ लूँ ..
इक पहेली सी.. ज़िदगी क्यों है तू…?

ना रास्तों का पता .. ना मंज़िलों की खबर ..
इतनी अजनबी अजनबी सी.. जिंदगी क्यों है तू…?

अपनी कोशिशों को नई जमी दे.. नया आसमा दे..
इक आरजू दबी दबी सी.. जिंदगी क्यों है तू…?

खामोशियाँ जो तू करदे बयाँ .. तो शोर सुनने लगेंगे..
इक कहानी कही अनकही सी… जिंदगी क्यों है तू…?

ख्वाहिशों को पंख दे.. भर ले ख्वाबों की उड़ाने..
इतनी सिमटी सिमटी सी.. जिंदगी क्यों है तू..?

Saturday, November 9, 2013

नींद आँखों से लापता क्यूँ है ..?
हर ख्वाब इन पलकों में ...
अब कांपता क्यूँ है ...?
और ज़रा सी जब आँख लगे ..
तो ये कम्बख़्त सुबह ...
मेरी खिड़कियों से झाकता क्यूँ है ...??
सांझ की धूप थोड़ी सी ..
भीगे बदल..
थोड़ी सी बारिश है ...
"कभी तो घर से बाहर निकलो"
खिड़कियों की मुझे से गुज़ारिश है...
"रात के जलते अंधेरों  ने अक्सर...
सुबहों को सवरते  देखा है ...
और जागती आँखों ने ही..
बदली दिनों की रूप रेखा है ..."