Wednesday, May 25, 2011

मेरी कविता को शीर्षक नही मिलता. -


व्याकुल बहती हैं भावनाएँ.. अनगिनत कई दिशाओं में ...
मोड़ दे जो इस विप्लव की धारा ..
ऐसा कोई दिशा-प्रदर्शक नही मिलता ..
पंक्तियाँ तो हैं बहुत ..
पर मेरी कविता को शीर्षक नही मिलता ..|

जीवन एक कोलाहल है ..
उद्वेलित भावों का..
शमित आत्म प्रवंचनाओं का..
या कि सिक़्वल है
घटित हो रही विडंबनाओं का...
अपनी सार्थकता को दे सकूँ पर्याय..
सार वह निष्कर्षक नही मिलता....
पंक्तियाँ तो हैं बहुत ..
पर मेरी कविता को शीर्षक नही मिलता ..|

जिंदगी के कई पड़ाव देखे .
शहर की चुभती धूप देखी .
गाव की हरी वादियों मे..
पर्वतों के पड़ते छाँव देखे.. .
जागती आँखों पे अधूरे सपने लिए..
नींद के जाने कितने बहाव देखे...
भागती रेल की खिड़कियों से ...
प्रकृति के उजड़ते परिधान देखे ...
संघर्षों की पराकाष्ठा पर ..
परिवर्तन के होते नव-विहान देखे....
सारे मंज़र बिसर गये,,
कुछ यादें थी जाने किधर गये...
बहुत ढूंढता हूँ यादों मे..
द्र्श्य वो आकर्षक नही मिलता..
पंक्तियाँ तो हैं बहुत ..
पर मेरी कविता को शीर्षक नही मिलता ..