Wednesday, December 21, 2011

सफ़र


1)
कितना अजीब, ज़िंदगी का ये सफ़र निकला,
सारे जहाँ का दर्द मेरे मुक़द्दर निकला....
माँगा पत्थर के ख़ुदाओ से, हर सजदा बेअसर निकाला..
कहा तो तय थी हसीन वादियाँ, मेरी मंज़िल का जर्रा जर्रा बंजर निकला

 2)  
काश कि मेरे अल्फाजों से किसी कि तकदीर संवर जाती....
तेरी खुशियों के आरजू में इक उम्र मेरी यू ही ना गुजर जाती.

हम नही बेचते अपने सपने .. मदहोशी के मयखानों को
होश की दुनिया हमारी जो इतनी ना बिखर जाती..


3)
उम्र की शाम ढलने लगी है ..
और रात की शमाओं के आसार नहीं हैं..
एक सदी गुज़ार दी हमने तेरे आने की राह में
और लोग समझते हैं हमें किसिका इंतजार नही है .. 


4)
आरजू हसरतें ख्वाहिशें कोशिशें..
रास्ते काफिले मंजिले मुश्किलें
समय की दौड़ में भागती जिंदगी
कभी ठहर इनके भुलावा देखिए ..
गर देखनी है जिंदगी की असलियत..
गौर से किसी का बुढ़ापा देखिए ..

तेरा ज़िक्र


कुछ लिख गये थे जाने क्या सोचकर ..
देखा तो ख्यालों की हू-ब-हू नकल हो गयी..

बस कोशिश थी तेरी यादों को समेटने की..
लोगों ने कहा खूबसूरत सी एक ग़ज़ल हो गयी..

मेरे हिस्से का सावन ले गये वो अपने पतझड़ों के बदले...
आ आ के लौट जाते हैं बादल.. मेरे आँगन के आसमानों से...
हवाओं के रुख़ मे जाने क्यू फेर-बदल हो गयी..

बहुत संभाला है इस शहर के अंधेरों ने मुझे..
रोशनी, मेरे सायों की दुश्मन आजकल हो गयी..

सब डूब के सुन रहे थे.. मेरे दर्द के नजमें..
तेरा ज़िक्र जो आया .. तो कई खामोशियों मे खलल हो गयी...