Wednesday, April 25, 2012

बरसने दो ..

बरसने दो .. इन रिमझिम बूँदों को ..
सुनी पलकें कब से बूँदों को तरसें हैं ...

उमड़े हैं सैलाब कई ...
ये आँख फिर भी कहा बरसे हैं

रही इस कदर गर्मियाँ गमों की
पलके आँसू आँसू तरसे हैं ..

घुटन उदासी और थकन....
ह्म पिघले पिघले अंदर हैं ..
हम झुलसे झुलसे बाहर से हैं..

भर जाने दो घर आँगन.. 
मस्त हवाओं के झोको से
भीगो लो तन मन..
यूँ पतझर में पावस कब बरसे हैं

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