Monday, July 9, 2012

जाने क्यूँ लोग समझते हैं... हम कम समझते हैं..

जाने क्यूँ लोग समझते हैं... हम कम समझते हैं..

भरी महफ़िल में तन्हाइयों के आलम.. समझते हैं....
हसते चेहरों में भी.. होती हैं पलकें नम.. समझते हैं

बेमौसम क्यूँ बरसता है.. इस शहर में मौसम.. समझते हैं..
जाने क्यूँ लोग समझते हैं... हम कम समझते हैं..

इश्क की आतिश.. मोहब्बत का गम समझते हैं..
क्यूँ दिखती नही है चाँद.. शब-ए-पूरनम.. समझते हैं..

रात पे क्या गुज़री है देख के दुनिया ..
ये तो बस शबनम समझते हैं ...

जिंदगी को अपने उम्र से बेहतर हम समझते हैं ..
जाने क्यूँ लोग समझते हैं... हम कम समझते हैं..

6 comments:

  1. well written Satya. I never knew about this part of your talent. I specially like the lines...
    रात पे क्या गुज़री है देख के दुनिया ..
    ये तो बस शबनम समझते हैं ...

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