Wednesday, September 12, 2012

अपने रहे ना अपने..

अपने रहे ना अपने.. पराए तो पराए थे
सफ़र भर साथ मेरे.. तो बस साये थे..

कि अब भी बाकी है वो गाँव मुझमें ...
जो गाँव लेके हम.. इस शहर में आए थे..

हाल जिंदगी का इन महलों में.. कोई हमसे पूछे
बेहतर तो वो दिन थे जो माटी के मकानों में बिताए थे

जिंदगी ने किराए पे दी है ये साजो-सामान
साथ वही लेकर जाना है जो लेके आए थे ..

1 comment:

  1. is kalam ne na jaane kitne dilon ko jhkjhora h aur aap khte hain ki ye kalam khamosh h..........

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