Friday, January 27, 2012

मेरे क्यूब(क्यूबिकल) का पौधा..


मेरे क्यूब का पौधा ..
वीकडेस की दूधियाई रोशनी मे नहाता..
वीकेंड के अंधेरों से घबराता है..

पालीथीन की क्यारी में .
खुद को जैसे तैसे समेटे..
दूर ग्लास की दीवारों की ओर..
अंधेरे में रोशनी की आश् लिए..
मेरे लाख सीधा किए...
हर बार मुड़ जाता है ..


मेरे क्यूब का पौधा ..
अपने में खोया.. कभी जागा कभी सोया ..
मुझे.. लॅपटॉप से अठखेलिया करते.. देख
जाने अनायास ही मुस्कुराता है ..

मेरे क्यूब का पौधा ..
इसके भी कई आरजू हैं .. कई अरमान है ..
कि खुली हवा मे साँस ले.. भीगे बारिश में झूमकर ..
एकटक देखे, क्यूँ.. इतना नीला आसमान है ..

किसी उँचे पर्वत की तराइयों में..
घने जंगल की.. अंगड़ाईयों में..
बगीचे की सजी क्यारियों में..  महकी पुरवाईयों में..
बच्चों को झूला झुलाते ,, गाव की अमराइयों में ..
पतझड़ से जूझे .. नयी कोपलें ले बसंत की तैयारियों में..

माँ धरती के आँचल से .. जीवन-रस ले ..
खुद को सृजन का विस्तार दे....
प्रकृति के संग हो ... जीवन को ..
फलों फूलों के अनगिनत उफहार दे..

पर मेरे क्यूब का पौधा..
एक विवश किरदार है.. नियती की लिखी कहानी का..
कुछ मेरी तरह ..
ज़रूरत है .. इसे भी
एसी की बंद साँसों का  ..
बोतलों मे भरी प्यूरिफ़ाइड.. मिनरल वाली पानी का..

मेरे क्यूब का पौधा..
चलते कीबोर्ड की खट-खट से ..
मीटिंगों के चहलपहल से .. दिन भर के हलचल से..
थक जाता है .. मुरझाता है ..
पेपर कप से पानी डालते  .. मुझे देख ..
हर सुबह एक नयी उमंग ले पत्ते फैलाकर नहाता है ..

Friday, January 20, 2012

लेखनी


वो लेखनी चल पड़ ...
तुझे नही रुकना है ...
छीनी जाएगी तुमसे स्याही ..
फिर भी तुझे नही झुकना है ...

तुम्हारे शब्दों से अर्थ मिटाए जाएँगे ..
उनके झूठ के साँसों के बदले,
तुमहारे सच दफ़नाए जाएँगे..
युग कोई भी हो.. अपनी शाख बचाने को ..
वो तुम्हारे ग्रंथ जलाने आएगें..
या वेबसाइट बंद कराने आएँगे ...

फिर भी पथ के बाधाओं से तुम्हें संभलना होगा.,,
उगलने को शोला.. तुम्हे खुद भी जलना होगा...
बदलने को इतिहास संग आँधियों के चलना होगा ..
यवस्था के ठोकरों से टूटे दिलों मे ख्वाब सा पलना होगा

हर रुँधे कंठ को तुम्हे ही स्वर देना है ..
राजतंत्र  के दमनों में ..
तुम्हे विद्रोह का कोलाहल भर देना है ..
सत्ता के मद मे चूर . आँखों से ..
तुम्हे रातों की नींद हर लेना है ..
देश बेचने वालों के स्वीस बैंक के खातों में ...
सड़ते काले धने से ..
भूख से व्याकुल पेटों का हिसाब लेना है ..
राजनीति के दावों में .. घड़ियाली आँसू रोते ..
चुनावी मौसम मे .. देश मे संप्रदायिक बीज बोते..
भ्रष्टतंत्र के बेटों को तुम्हे ही जवाब  देना है..

  वो लेखनी चल पड़ ...
तुझे नही रुकना है ...
 लिखने को हाथ चले ना चले ..
.. तुझे नही थकना है

Saturday, January 7, 2012

तुम से कौन कहेगा आकर..


(1st line is from Kumar Vishwas ..)
तुम से कौन कहेगा आकर..
मेरे सपनों की मिलन कहानी..
यादों के घने मेघों से निकली..
आखों से बरसती रिमझिम पानी ..
लौट जाती है.. हर रात नींद सुहानी
इन जागती आँखों को खुली पाकर..
तुम से कौन कहेगा आकर..

कितने मौसम बदले.. कितने सावन गुज़रे..
कितनी बेले साखों पे .. सज धज के उजड़े..
भावों ने मधुर झंकार किए..
सपनो ने फिर शृंगार किए..
बरसी हम पे मधु हालाएँ..
हम से बहकी.. कई मधुशालाएँ ..
कुछ भी तो ना भाया इस मन को ..
.. एक तुमको भाकर..
तुम से कौन कहेगा आकर..

जाने कितने मीत छूटे ..
जाने कितने प्रीत छूटे..
आ आ कर होठों पे..
अधूरे कितने गीत छूटे..
टूटे सारे रिश्ते नाते..
जाने कितने अपने रूठे..
क्यों खोया सब हमने तुमको ना पाकर...
तुम से कौन कहेगा आकर..



जीवन उजड़ा..  एक उपवन है ..
टूटा बिखरा.. कलरव से सुना मधुबन है..
कुछ को तरस आती है इस दशा पर ..
कुछ हस्ते हैं मेरी व्यथा पर..
फिर भी जीता हूँ.. जाने किस आशा पर ..
तुम से कौन कहेगा आकर..