Monday, July 16, 2012

कोई दर्द मुझमें अब.. चिल्लाता क्यूँ नही..?

कोई दर्द मुझमें अब..
चिल्लाता क्यूँ नही..?
अश्क आँखों में गर है..
तो पलकों पे आता क्यूँ नही..?
पराए बनके हसाते तो सभी हैं ..
कोई बनके अपना.. रुलाता क्यूँ नहीं.. ?
चलने का जुनूँ.. अब भी है मुझे..
राह-ए-मंज़िल कोई.. हमें बुलाता क्यूँ नही.. ?
शब-ए-उम्र गुज़री है.. इसी इंतजार में ..
कोई ख्वाब मेरी पलकों तक आता क्यूँ नहीं ...?

Monday, July 9, 2012

जाने क्यूँ लोग समझते हैं... हम कम समझते हैं..

जाने क्यूँ लोग समझते हैं... हम कम समझते हैं..

भरी महफ़िल में तन्हाइयों के आलम.. समझते हैं....
हसते चेहरों में भी.. होती हैं पलकें नम.. समझते हैं

बेमौसम क्यूँ बरसता है.. इस शहर में मौसम.. समझते हैं..
जाने क्यूँ लोग समझते हैं... हम कम समझते हैं..

इश्क की आतिश.. मोहब्बत का गम समझते हैं..
क्यूँ दिखती नही है चाँद.. शब-ए-पूरनम.. समझते हैं..

रात पे क्या गुज़री है देख के दुनिया ..
ये तो बस शबनम समझते हैं ...

जिंदगी को अपने उम्र से बेहतर हम समझते हैं ..
जाने क्यूँ लोग समझते हैं... हम कम समझते हैं..

Sunday, July 8, 2012

परछाईयाँ ..

परछाईयाँ ...परछाईयाँ ....
हर साया मेरा..
ढूँढे तेरी परछाईयाँ ...
खोजती झाँकती खुदमें..
मेरी रूह की गहराइयाँ....
तेरी परछाईयाँ ....

जिन अंधेरों में..
उजालों में..
मेरी परछाईयों से
मिलती थी तेरी परछाईयाँ....
लेती हैं अंगड़ाईयाँ...
अब भी वहाँ...
मेरी परछाईयों में..
तनहाईयाँ....

रुसवाईयाँ.. रुसवाईयाँ..
सरे राह मिली रुसवाईयाँ..
पूरवाइयां ... पूरवाइयां
चलती हैं बेवफा पूरवाइयां
खाईयाँ.. यादों की खाईयाँ..
लेकर वफ़ा की लाश हमने
लाँघी यादों की सारी ख़ाइयाँ
बनके आँखों में झाइयाँ ...
अब भी बाकी है मुझमें...
परछाईयाँ ...परछाईयाँ....
तेरी परछाईयाँ

Thursday, July 5, 2012

बहुत उड़ लिए..

बहुत उड़ लिए..
हवाओं के संग संग..
कभी अपने इरादों के पंख...
फैला के तो देखो ...
है गुरूर बहुत..
आँधियों को अपने ज़ोर पे ..
तुम भी अपने परों के हौसले...
आजमा के तो देखों ..