Thursday, September 27, 2012

ये बदलने का दौर है ..

ये बदलने का दौर  है ..
चलो हम भी बदल के देखते हैं ..

बहुत गिराया है व्क़्त की आँधियों ने ..
थोड़ा संभाल के देखते हैं ..

जाने कब  से कुछ  ख्वाब..
..बस ख्वाब हैं
चलो कुछ ख्वाब
हक़ीक़त में बदल के देखते हैं ..

निखरने के लिए... जलना तो पड़ता है
चलो इस लौ में थोड़ा सा.. जल के  देखते हैं

क़ि कब तलक चलते रहेंगे ..
वही पुरानी राहों में ..
कुछ नयी राह.. अब चल के देखते हैं ...

ये बदलने का दौर  है ..
चलो हम भी बदल के देखते हैं ..

Wednesday, September 12, 2012

अपने रहे ना अपने..

अपने रहे ना अपने.. पराए तो पराए थे
सफ़र भर साथ मेरे.. तो बस साये थे..

कि अब भी बाकी है वो गाँव मुझमें ...
जो गाँव लेके हम.. इस शहर में आए थे..

हाल जिंदगी का इन महलों में.. कोई हमसे पूछे
बेहतर तो वो दिन थे जो माटी के मकानों में बिताए थे

जिंदगी ने किराए पे दी है ये साजो-सामान
साथ वही लेकर जाना है जो लेके आए थे ..

Sunday, September 2, 2012

हमने भी देखा समंदर.. बहुत करीब से इस बार ...

लहरों में.. हसरतों का
उमड़ता ज्वार..
और किनारों का..
अंतहीन इंतजार..
हमने भी देखा समंदर.. 
बहुत करीब से इस बार ...

देखा नज़रों के सीमाओं से..
परे फैला हुआ विस्तार..
और झूमती सी व्यस्त दुनिया
किनारों के इस पार..
किनारों के उस पार ..
हमने भी देखा समंदर.. 
बहुत करीब से इस बार ...

युगों से मौन चट्टानें..
सहकर आँधिया.. कितनी तूफ़ानें 
तोड़कर रेत करने...
आतुर अनेको धार..
जूझने का संदेश देती
झेलती अस्तित्व पे..
अपने अनवरत वार..
हमने भी देखा समंदर.. 
बहुत करीब से इस बार ...

इक परिंदा आ रहा था
जूझता पागल हवा से ..
लौटकर जाने कहा से ..
मानो निकला हो
समंदर लाँघ जाने..
लहरों के विपरीत उड़ाने..
किनारे थे नही स्वीकार
परों ने उसके अब भी..
ना मानी थी हार...
हमने भी देखा समंदर.. 
बहुत करीब से इस बार ...