Tuesday, May 28, 2013

क्यूँ होता है किसी रोज..
दिन लेके आता है/ढेर सारे पत्थर/मारने ..
और अपनी चटख/की बौखलाहट में
हम तोड़ने लगते हैं ..
कुछ रिश्ते/कुछ सपने/कुछ अपने..
और शाम आती है...
सर पे इक भारी बोझ लिए ..
सही.. ग़लत का....
और माँगने लगती है रात से
हिसाब..

Friday, May 24, 2013

ना रास्तों की खबर है.. ना मंज़िल का पता ..
जिंदगी.. जाने ये किस मोड़ पे छोड़ गई है ..
कुछ ख्वाब छुपा रखे थे.. पलकों के आलों में
सुना है शैतान हक़ीकत... सब तोड़ गई है ...

Wednesday, May 8, 2013

ख्वाहिशें

ख्वाहिशें.. मन के इन-बाक्स में.. स्पैम सी हो रही हैं ..
और भावनाओं का हर मेल.. ड्राफ्ट.. में ही रह गया है.......
जिंदगी भूले पासवर्ड वाली.. उस ई-मेल अकाउंट सी हो गई है ..
जिसका सेक्यूरिटी क्वेस्चन.. हमें फकत एक मज़ाक लगा था..

Friday, May 3, 2013

बहुत कम मिलते हैं.

फ़ुर्सत के पल अब .. बहुत कम मिलते हैं..
हो तन्हा शाम और आँख नम.. बहुत कम मिलते हैं...
सबसे मिलना तो होता है रोजाना.. मगर..
खुद से आजकल हम .. बहुत कम मिलते हैं..