Saturday, November 9, 2013

नींद आँखों से लापता क्यूँ है ..?
हर ख्वाब इन पलकों में ...
अब कांपता क्यूँ है ...?
और ज़रा सी जब आँख लगे ..
तो ये कम्बख़्त सुबह ...
मेरी खिड़कियों से झाकता क्यूँ है ...??
सांझ की धूप थोड़ी सी ..
भीगे बदल..
थोड़ी सी बारिश है ...
"कभी तो घर से बाहर निकलो"
खिड़कियों की मुझे से गुज़ारिश है...
"रात के जलते अंधेरों  ने अक्सर...
सुबहों को सवरते  देखा है ...
और जागती आँखों ने ही..
बदली दिनों की रूप रेखा है ..."
"मुझे कहाँ.. किसी सुकून-ए-ख्वाब की आरजू ..
नींद क्यूँ आई है ??.. जा कहीं और तू...."
"उजाले बिजलियों की इतनी रही ...
दिया अपनी परछाई देखता रह गया....
अंधेरों को जब हटा के देखा ..
तो खुद की .. फकत तन्हाइई देखता रह गया..."