Tuesday, February 18, 2014

हर सुलझन में.. इक उलझन है
इतनी उलझी हुई सी .. ज़िदगी क्यों है तू…?

कोई ना समझे.. मेरी उलझन …
सबकी सुलझी हुई सी.. ज़िदगी क्यों है तू…?

दूसरा खो जाता है .. जो इक सिरा मैं ढूँढ लूँ ..
इक पहेली सी.. ज़िदगी क्यों है तू…?

ना रास्तों का पता .. ना मंज़िलों की खबर ..
इतनी अजनबी अजनबी सी.. जिंदगी क्यों है तू…?

अपनी कोशिशों को नई जमी दे.. नया आसमा दे..
इक आरजू दबी दबी सी.. जिंदगी क्यों है तू…?

खामोशियाँ जो तू करदे बयाँ .. तो शोर सुनने लगेंगे..
इक कहानी कही अनकही सी… जिंदगी क्यों है तू…?

ख्वाहिशों को पंख दे.. भर ले ख्वाबों की उड़ाने..
इतनी सिमटी सिमटी सी.. जिंदगी क्यों है तू..?