Thursday, February 19, 2015

फिर से

फिर पलकों में रात जागी है ..
फिर  नींद का नामोंनिशा ना था…
फिर से ख्वाब बेच के, खरीदा है रतजगा…
ना अंधेरे थे .. ना यादों का कारवाँ था ..
फिर से.. एक रात गुज़री है सुकून से …
फिर से जागी है इक सुबह…
लेकर आँखों में…  कोई जुनून से …
फिर से लगा है कि.. दिन हो गया है …
फिर से लगा है कि मुश्किल था…
जो ‘कल’ वो  ’आज’ कुछ मुमकिन हो गया है .